Monday, August 30, 2010
Sunday, August 29, 2010
Saturday, April 24, 2010
दरख्त
आज भी याद आती है उनकी जब दरख्तों से पत्ते साथ छोड़ देते
कुछ दूर साथ चलकर जो अपनों का हाथ छोड़ देते है
हम तो फिर भी दिल में उनकी यादों को साथ रखते है
एक वो ही हैं जो नजरों के सामने आते ही मूह फेर लेते है
आज भी याद आती है उनकी जब दरख्तों से पत्ते साथ छोड़ देते
कभी एक पल भी हमारे बिना वो जी नहीं पते थे
आज अकेले ही मंजिलों का मीलों सफ़र तय करते है
हम तो आज भी इंतजार कर रहे उस पल का
जब कोई हमारी गली में उनको बापस लेकर आएगा
उसका क़र्ज़ तो हम अदा न कर पायंगे बस दिल ही दिल में
उसके एहसानों को रखकर प्यार के साथ याद किय जायेंगे
Monday, January 4, 2010
मन का विस्वास ही सफलता दिलाता है
जब में १० अगस्त २००९ को जबलपुर से भोपाल आया था तो मन में डर था यदि काम अच्छा नहीं कर पाया तो कहीं का नहीं रह जाऊँगा लेकिन अपने आप पर विस्वास और कुछ कर दिखाने के लिए ये रिस्क ली अबमैं राहत महसूस कर रहा हूँ क्योंकि शहर को जान ने लगा हूँ भोपाल और जबलपुर के लोगों में बहुत अंतर है यहाँ मिलनसार और मददगार ज्यादा है तो जबलपुर मैं इसका प्राटिस्ट कम है यहाँ कामं की वैल्यू है न की चापलूसों की जमात की बतोर फोटोजर्नलिस्ट एक पहचान बन रही है जिसकी सुरूआत अच्छी हुई कभी सोचता हूँ की यही काम जबलपुर मैं करता था लेकिन वो नाम नहीं मिला और न ही काम दिखाने का मौका 8 कॉलम फोटो नाम सहित इससे पहले कभी भी नहीं लगे जबलपुर नव भारत , देनिक भास्कर ,हरी भूमि का मेरा अनुभव बहुत बूरा रहा हई जहाँ अच्छे लोगों के साथ बुरे ज्यादा मिले लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपना काम करता रहा मेरा आलोचकों की संख्या बहुत है क्योंकि मैं अपने काम में किसी की नहीं सुनता था रिपोर्टर प्रेस का काम कम अपनी नौकरी ज्यादा करवाते थे जो की मुझे मंजूर नहीं था भोपाल की एक और खासियत यहाँ फोटो ग्राफर और रिपोर्टर में समानता हई जबकि जबलपुर में फोटो ग्राफर को रिपोर्टर से जूनियर माना जाता है चाहे वो रिपोर्टर की उम्र का अनुभव रखता हो इन्हीं बातों से परेशान था में पर उपर वाले ने मेरी सुन ली और मुझे आज भोपाल में काम करने का मौका दिया
Saturday, December 5, 2009
मेरे बारे में - एक फोटोग्राफर पत्रकार नही बन सकता यानि की लिख नही सकता । जब ये बात बार बार मुझे लोग कहते थे तो बुरा टी लगता था पर सोचने पर मजबूर हो जाता था की ये सब एसा क्यों कहते ही थोड़ी खोज कारने पर पता चला की शहर के फोटोग्राफरो का इतिहास ही इस बात का जिम्मेदार हे । वे अपनी दुकानदारी लगवाने के चक्कर में पत्रकारों के आगे पीछे जी हजुरी करते थे या यूं की करते हैं । जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ रहा है फिर भी मेने हर नहीं मानी और आज तक संघर्स कर रहा हूँ की कभी तो इस धारणा को बदल पाऊंगा जिसमे कुछ हद तक कामयाबी मिली है किन्तु संतुस्टीके लिए बहुत कुछ बाकी है। मेरी सुरूआत देश बंधू से हुई वहां मनोज वर्मा का साथ मिला जिन्होंने मुझे प्रेस फोटोग्राफी के विषय में बताया उनके साथ काम करने से मुझ में कांफिडेंस आया । जब नवभारत में था तब मुझे श्री पंकज शुक्ल जी ने एक बात कही थी की इन बातो को ध्यान मत दो और अपना कम करो तुम लिखना चाहते हो लिखो ये कोई जरूरी नहीं की डिग्री वाले ही रिपोर्टिंग कर सकते है। ये बात मेरे लिए वरदान साबित हुई जिससे आज में जो भी हूँ इसका श्रेय श्री पंकज शुक्ल जी को देता हूँ .एसा नहीं की किसी और ने मेरे लिए कुछ न किया हो लेकिन बीज अंकुरित करना फिर पोधे को रोप कर उसे सहेजने वाला ही उसका संरक्षक होता है .
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