तुम्हारी तस्वीर
जब भी इस गली आता हूं मैं
तुम्हारी तस्वीर नजर आ जाती है
न चाहते हुए नजर रुक जाती है
जानें क्या बात है इसमें समाई
न मैं तुम्हारा हूं, न तुम हो पराई
आंखों से दिल में ये उतर आई
अब हर पल, हल लम्हा देखूं
ऐसा कहता है ये मन
विचलित होकर भी स्थिर हूं
कर लिए लाख जतन
बस तुमको पाना है मकसद अब
उम्र का बंधन तोड़कर आना होगा
हर निगाह से तुमको बचाना होगा
सोचता हूं वो घड़ी आएगी कब
जब भी इस गली आता हूं मैं
तुम्हारी तस्वीर नजर आ जाती है
- लाली कोष्टाSaturday, January 30, 2016
तुम्हारी तस्वीर
तुम्हारी तस्वीर
जब भी इस गली आता हूं मैं
तुम्हारी तस्वीर नजर आ जाती है
न चाहते हुए नजर रुक जाती है
जानें क्या बात है इसमें समाई
न मैं तुम्हारा हूं, न तुम हो पराई
आंखों से दिल में ये उतर आई
अब हर पल, हल लम्हा देखूं
ऐसा कहता है ये मन
विचलित होकर भी स्थिर हूं
कर लिए लाख जतन
बस तुमको पाना है मकसद अब
उम्र का बंधन तोड़कर आना होगा
हर निगाह से तुमको बचाना होगा
सोचता हूं वो घड़ी आएगी कब
जब भी इस गली आता हूं मैं
तुम्हारी तस्वीर नजर आ जाती है
- लाली कोष्टाSaturday, August 24, 2013
Saturday, July 6, 2013
Wednesday, May 11, 2011
Thursday, January 20, 2011
इश्क का अंजाम
प्यार में बस काम यही होता है,
कि आदमी कोई काम का नहीं रहता,
प्यार करने का अंजाम यही होता है,
गर यकीं न हो तो दिल देके देख लो,
मुहब्बत में गम के आंसू पीकर देख लो,
पता चल जायेगा इश्क का अंजाम,
ज़माने से इसे छुपाकर तो देख लो .
.......................................लाली
Monday, January 17, 2011
Saturday, October 30, 2010
Friday, October 15, 2010
Tuesday, October 12, 2010
Saturday, October 9, 2010
Friday, October 8, 2010
Monday, September 13, 2010
Saturday, September 4, 2010
तेरी याद आई

आज शाम फिर तेरी याद आई
तू ना रही बस थी तन्हाई
यूं आकाश में अकेला उड़ा था
साथ था तेरा प्यार
खुसबू से महकी हवा
खींचे चले आये प्यार के मारे
मंजिल का तो पता नहीं मेरी
लोगो को मंजिल तक पहुचाना
यही मेरा काम है
तेरे प्यार का दूसरा यही नाम है
साथ था तेरा प्यार
खुसबू से महकी हवा
खींचे चले आये प्यार के मारे
मंजिल का तो पता नहीं मेरी
लोगो को मंजिल तक पहुचाना
यही मेरा काम है
तेरे प्यार का दूसरा यही नाम है
Monday, August 30, 2010
Sunday, August 29, 2010
Saturday, April 24, 2010
दरख्त
आज भी याद आती है उनकी जब दरख्तों से पत्ते साथ छोड़ देते
कुछ दूर साथ चलकर जो अपनों का हाथ छोड़ देते है
हम तो फिर भी दिल में उनकी यादों को साथ रखते है
एक वो ही हैं जो नजरों के सामने आते ही मूह फेर लेते है
आज भी याद आती है उनकी जब दरख्तों से पत्ते साथ छोड़ देते
कभी एक पल भी हमारे बिना वो जी नहीं पते थे
आज अकेले ही मंजिलों का मीलों सफ़र तय करते है
हम तो आज भी इंतजार कर रहे उस पल का
जब कोई हमारी गली में उनको बापस लेकर आएगा
उसका क़र्ज़ तो हम अदा न कर पायंगे बस दिल ही दिल में
उसके एहसानों को रखकर प्यार के साथ याद किय जायेंगे
Monday, January 4, 2010
मन का विस्वास ही सफलता दिलाता है
जब में १० अगस्त २००९ को जबलपुर से भोपाल आया था तो मन में डर था यदि काम अच्छा नहीं कर पाया तो कहीं का नहीं रह जाऊँगा लेकिन अपने आप पर विस्वास और कुछ कर दिखाने के लिए ये रिस्क ली अबमैं राहत महसूस कर रहा हूँ क्योंकि शहर को जान ने लगा हूँ भोपाल और जबलपुर के लोगों में बहुत अंतर है यहाँ मिलनसार और मददगार ज्यादा है तो जबलपुर मैं इसका प्राटिस्ट कम है यहाँ कामं की वैल्यू है न की चापलूसों की जमात की बतोर फोटोजर्नलिस्ट एक पहचान बन रही है जिसकी सुरूआत अच्छी हुई कभी सोचता हूँ की यही काम जबलपुर मैं करता था लेकिन वो नाम नहीं मिला और न ही काम दिखाने का मौका 8 कॉलम फोटो नाम सहित इससे पहले कभी भी नहीं लगे जबलपुर नव भारत , देनिक भास्कर ,हरी भूमि का मेरा अनुभव बहुत बूरा रहा हई जहाँ अच्छे लोगों के साथ बुरे ज्यादा मिले लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपना काम करता रहा मेरा आलोचकों की संख्या बहुत है क्योंकि मैं अपने काम में किसी की नहीं सुनता था रिपोर्टर प्रेस का काम कम अपनी नौकरी ज्यादा करवाते थे जो की मुझे मंजूर नहीं था भोपाल की एक और खासियत यहाँ फोटो ग्राफर और रिपोर्टर में समानता हई जबकि जबलपुर में फोटो ग्राफर को रिपोर्टर से जूनियर माना जाता है चाहे वो रिपोर्टर की उम्र का अनुभव रखता हो इन्हीं बातों से परेशान था में पर उपर वाले ने मेरी सुन ली और मुझे आज भोपाल में काम करने का मौका दिया
Saturday, December 5, 2009
मेरे बारे में - एक फोटोग्राफर पत्रकार नही बन सकता यानि की लिख नही सकता । जब ये बात बार बार मुझे लोग कहते थे तो बुरा टी लगता था पर सोचने पर मजबूर हो जाता था की ये सब एसा क्यों कहते ही थोड़ी खोज कारने पर पता चला की शहर के फोटोग्राफरो का इतिहास ही इस बात का जिम्मेदार हे । वे अपनी दुकानदारी लगवाने के चक्कर में पत्रकारों के आगे पीछे जी हजुरी करते थे या यूं की करते हैं । जिसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ रहा है फिर भी मेने हर नहीं मानी और आज तक संघर्स कर रहा हूँ की कभी तो इस धारणा को बदल पाऊंगा जिसमे कुछ हद तक कामयाबी मिली है किन्तु संतुस्टीके लिए बहुत कुछ बाकी है। मेरी सुरूआत देश बंधू से हुई वहां मनोज वर्मा का साथ मिला जिन्होंने मुझे प्रेस फोटोग्राफी के विषय में बताया उनके साथ काम करने से मुझ में कांफिडेंस आया । जब नवभारत में था तब मुझे श्री पंकज शुक्ल जी ने एक बात कही थी की इन बातो को ध्यान मत दो और अपना कम करो तुम लिखना चाहते हो लिखो ये कोई जरूरी नहीं की डिग्री वाले ही रिपोर्टिंग कर सकते है। ये बात मेरे लिए वरदान साबित हुई जिससे आज में जो भी हूँ इसका श्रेय श्री पंकज शुक्ल जी को देता हूँ .एसा नहीं की किसी और ने मेरे लिए कुछ न किया हो लेकिन बीज अंकुरित करना फिर पोधे को रोप कर उसे सहेजने वाला ही उसका संरक्षक होता है .
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